महाराष्ट्र
: कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है जहाँ से आगे का रास्ता केवल हौसलों से ही तय होता है. जब जेब में पैसे नहीं होते, लेकिन आंखों में सपने जगमगा रहे होते हैं — वहीं से शुरू होती है एक असली कहानी.

महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव की धूलभरी गलियों में एक लड़का अपने गोलगप्पे (पानी पूरी) के ठेले को धूप और धूल से लड़ते हुए खींच रहा था. लोग उसे एक मामूली गोलगप्पे बेचने वाला समझते थे, लेकिन उसके भीतर पल रहा सपना आम नहीं था — वह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का हिस्सा बनना चाहता था. यह कहानी है रामदास हेमराज मारबड़े की — उस लड़के की जिसने गरीबी, मुश्किलों और सामाजिक सीमाओं को मात देकर, केवल अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प के बलबूते ISRO (Indian Space Research Organisation) तक का सफर तय किया.

जब अधिकांश लोग हालात से हार मान लेते हैं, रामदास ने हालात को चुनौती दी और दिखा दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी सपना नामुमकिन नहीं होता. यह सिर्फ एक नौकरी पाने की कहानी नहीं है, यह है एक सपने को जीने की जिद और आसमान से भी ऊंची उड़ान भरने की प्रेरणा.

गांव से ISRO तक का सफर

महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के एक छोटे से गांव खैरबोड़ी से निकलकर, रामदास हेमराज मारबड़े ने एक ऐसा सपना साकार किया है जो लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, दिन में गोलगप्पे बेचने वाला यह लड़का रात में पढ़ाई करता था और आज 25 वर्ष की उम्र में वह भारत की सबसे प्रतिष्ठित अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था ISRO में जॉब कर रहा है. रामदास की कहानी हिम्मत, जुनून और अथक परिश्रम का जीवंत उदाहरण है.

गोलगप्पे बेचकर पूरी की कॉलेज की पढ़ाई

रामदास का बचपन सामान्य आर्थिक स्थितियों में बीता. उनके पिता एक सरकारी स्कूल में चपरासी थे और मां गृहिणी. संसाधनों की कमी के बावजूद परिवार ने रामदास के सपनों में विश्वास बनाए रखा. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्कूल की पढ़ाई उन्होंने गणेश हाई स्कूल, गुमधवाड़ा से और 12वीं की पढ़ाई सी. जी. पटेल कॉलेज से की. कॉलेज की नियमित पढ़ाई संभव नहीं थी, इसलिए उन्होंने नासिक के वायसीएम कॉलेज से बी.ए. की पढ़ाई प्राइवेट रूप से पूरी की. इस दौरान वह गांव-गांव जाकर गोलगप्पे बेचकर परिवार का सहारा बने और अपनी पढ़ाई का खर्च भी निकाला.

तकनीकी ज्ञान बना सफलता की चाबी

रामदास ने महसूस किया कि तकनीकी कौशल के बिना आगे बढ़ना मुश्किल है. इसी सोच के तहत उन्होंने तिरोड़ा के आईटीआई (Industrial Training Institute – ITI) से पंप ऑपरेटर-कम-मेकैनिक का कोर्स किया. यहां उन्होंने सेंट्रीफ्यूगल और रेसिप्रोकेटिंग पंप चलाना, जल शोधन की तकनीकें और ऑयल इक्विपमेंट्स की मरम्मत जैसी प्रैक्टीकल स्किल्स सीखी.

ISRO में नौकरी: जब सपनों को मिली उड़ान

ISRO की ओर से अप्रेंटिस ट्रेनी के लिए आवेदन मांगे गए. रामदास ने तुरंत आवेदन किया और 2024 में नागपुर में लिखित परीक्षा पास की. इसके बाद उन्होंने श्रीहरिकोटा (Sriharikota) में आयोजित स्किल टेस्ट को भी सफलतापूर्वक पास किया. मई 2025 में उन्हें ISRO से नियुक्ति पत्र मिला और एक नया चैप्टर शुरू हुआ. आज रामदास श्रीहरिकोटा स्थित ISRO स्पेस सेंटर में पंप ऑपरेटर-कम-मेकैनिक पोस्ट पर जॉब कर रहे हैं. अब उनकी दिनचर्या गोलगप्पों की प्लेटों से नहीं, बल्कि अत्याधुनिक यंत्रों की मरम्मत और अंतरिक्ष अभियानों की तकनीकी तैयारी से जुड़ी है. यह यात्रा सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि उनके पूरे गांव के लिए गर्व का विषय बन गई है.

युवाओं के लिए रामदास बने प्रेरणास्रोत

रामदास हेमराज मारबड़े की कहानी हमें सिखाती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो और मेहनत में ईमानदारी हो, तो कोई भी सपना हकीकत बन सकता है. उन्होंने दिखाया कि सच्ची प्रेरणा न केवल अखबारों की सुर्खियों में मिलती है, बल्कि वह तो अक्सर गांव की गलियों में गोलगप्पे की गाड़ी खींचते हुए भी दिखाई देती है — बस जरूरत है उसे पहचानने की.

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