नई दिल्‍ली: Nepal GEN Z Protest: नेपाल में युवाओं की (GEN-Z) क्रांति के बाद तख्तापलट हो गया है. नेपाल में राजनीतिक संकट गहरा रहा है. युवाओं का एक अलग ही रूप इस आंदोलन के बीच देखने को मिला. इस आंदोलन के बीच काला पानी विवाद भी एक बार फिर चर्चा में आ गया है. ये विवाद तक का है, जब उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं और हिमाचल के कांगड़ा के पास सतलुज नदी तक नेपाल का साम्राज्‍य फैला हुआ था. आखिर यह कालापानी विवाद हैं क्या? क्यों भारत और नेपाल के बीच रह-रहकर  कालापानी विवाद उठकर सामने आ जाता है? कालापानी विवाद को समझने के लिए हमें 209 साल पीछे जाना होगा, जब भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था और नेपाल लगातार अपनी सीमाओं को बढ़ा रहा था.

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ब्रिटिश इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच 2 साल चला युद्ध

कालापानी, भारत-नेपाल विवाद 1816 में सुगौली की संधि के बाद शुरू हुआ. 1814 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच युद्ध हुआ था. तब नेपाल में गोरखाओं का शासन हुआ करता था. गोरख अंपायर लगातार भारत के कई हिस्सों पर कब्जा कर चुका था. यही वजह थी कि ब्रिटिश इंडिया कंपनी और नेपाल गोरखा शासको के बीच 1814 में युद्ध हुआ था. यह युद्ध 1816 तक चला. लगभग 2 साल चले इस युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच 4 मार्च 1816 को संधि पर हस्‍ताक्षर हुए.

महाकाली नदी पर भारत-नेपाल का विवाद

इस संधि में नेपाल और ब्रिटिश भारत की सीमा निर्धारित की गई. दोनों देशों के बीच बहने वाली महाकाली नदी के मध्य सीमा का निर्धारण किया गया. महाकाली नदी कालापानी से बहती है और विवाद यहीं से शुरू हुआ. काला पानी विवाद का प्रमुख कारण महाकाली नदी के वास्तविक और प्राथमिक स्रोत के बारे में अलग-अलग राय का होना है. लेकिन भौगोलिक दृष्टि से कई सहायक छोटी-छोटी नदियां महाकाली नदी से काला पानी में मिलती हैं. इसी कारण भारत का दावा है कि महाकाली नदी का उद्गम स्थल कालापानी है, जहां महाकाली मंदिर का भी निर्माण है. नेपाल का मानना है कि महाकाली नदी लिपुलेख से शुरू होती है, जबकि भारत, नेपाल के इस दावे को पूरी तरह से खारिज करता है. भारत का कहना है कि ये ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है.

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लिपुलेख दर्रे का पौराणिक महत्‍व…

कालापानी क्षेत्र भारत के मानचित्र में उत्तराखंड राज्य में स्थित है और यह लगभग 372 वर्ग किलोमीटर का है. इस क्षेत्र से ही कैलाश मानसरोवर की यात्रा होती है. उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के धारचूला क्षेत्र में ही यह कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा आता है. यह क्षेत्र भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद ही महत्वपूर्ण है. इसके एक तरफ नेपाल है, तो दूसरी तरफ तिब्बत-चीन का बॉर्डर है. लिपुलेख दर्रा लगभग 5200 मीटर यानी 17060 फुट की ऊंचाई पर स्थित है. यह दर्रा भारत को तिब्बत चीन से जोड़ता है और कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए पारंपरिक और पौराणिक मार्ग है. यह भारत, नेपाल और तिब्बत चीन के बीच त्रिपक्षीय सीमा का सेंटर पॉइंट है, जिसके कारण यह बेहद ही सामरिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है. प्राचीन काल में भारत और तिब्बत के बीच यहां से व्यापार होता था.

209 साल पुराना विवाद

भारत लिपुलेख दर्रा का इस्‍तेमाल चीन की सैन्य गतिविधियों पर निगरानी के लिए करता है. इसी क्षेत्र से भारत और चीन के बीच व्यापार होता रहा है. इसलिए व्यापारिक दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण क्षेत्र है. भारत और नेपाल के बीच इसे लेकर विवाद 209 साल पुराना है. नेपाल, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के कालापानी इलाके पर अपना दावा करता रहा है. लेकिन यह भारत का हिस्सा है और इस विवाद को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच कई बार की वार्ता हुई है. 1980 में सीमा विवाद को सुलझाने के लिए भारत सरकार ने एक कमेटी का गठन किया था. हालांकि इसका कोई नतीजा नहीं निकला, एक बार फिर से 1997 में भारत और नेपाल की एक संयुक्त टीम को विवादित स्थल पर भेजने का फैसला किया गया था, लेकिन यह टीम उस विवादित स्‍थल पर नहीं पहुंच पाई.

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जब नेपाल के नक्‍शें में काला पानी… 

नेपाल ने साल 2020 में अपने नक्‍शे में काला पानी, लिपुलेख, लिंपियाधुरा को दर्शाया, जिसके बाद एक बार फिर से यह विवाद चरम पर आ गया. अब जबकि नेपाल में GEN-Z क्रांति के बाद तख्तापलट होने के बाद वहां सोशल मीडिया पर काला पानी विवाद की बातें सामने आ रही हैं. इसके अलावा कई बार नेपाल से ग्रेट नेपाल की बातें भी सामने आ रही हैं. ग्रेट नेपाल वह इलाका है, जो 1814 से पहले गोरखा शासकों ने उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं, हिमाचल के कांगड़ा के पास सतलुज नदी तक, सिक्किम के ज्यादातर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था. इसके अलावा राप्ती गंदगी, कोसी तीस्ता और मेची नदी के कई तराई क्षेत्र पर गोरखा साम्राज्य फैला हुआ था. लेकिन 1816 में हुई सुगौली की संधि के बाद भारत और नेपाल की सीमा तय कर दी गयी थी.

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